श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 1 / 18 · 47 श्लोक · Read in English
1. अर्जुनविषादयोग — अर्जुन की मूढ़ता का योग
Arjuna Viṣāda Yoga (अर्जुनविषादयोग)
paralysis
सार
युद्धभूमि पर अर्जुन अपने स्वजनों — गुरुजनों, भाइयों, मित्रों — को विरोधी पक्ष में देखकर शोक से व्याकुल हो उठते हैं। उनके अंग शिथिल हो जाते हैं, गाण्डीव हाथ से गिर पड़ता है। वे श्रीकृष्ण से कहते हैं — "मैं युद्ध नहीं करूँगा।" यह केवल युद्ध-संशय का चित्रण नहीं; यह हर मनुष्य के जीवन की उस घड़ी का दर्पण है जब कर्तव्य सामने हो और मन उसके भार से जम जाए।
मूल शिक्षा
नैतिक संकट का सबसे प्रामाणिक रूप वह है जब हम सही कर्म जानते हुए भी उसे करने में असमर्थ हों। गीता इसी असमर्थता से आरम्भ होती है।
आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
जब आप किसी कठिन निर्णय के सम्मुख अकेले खड़े हों — रिश्ता समाप्त करना, नौकरी छोड़ना, सत्य कहना — और मन काँप जाए, तो जान लें: यही अर्जुन-क्षण है। गीता का समस्त संवाद इसी क्षण के लिए रचा गया है।