श्रीमद्भगवद्गीता · Read in English
श्रीमद्भगवद्गीता
गीता
व्यावहारिक ज्ञान का मार्ग — श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन की मूढ़ता का उत्तर, आज के जीवन के लिए सजीव।
श्रीमद्भगवद्गीता का सम्पूर्ण रूप, व्यवहार के लिए ढाला हुआ: सभी 18 अध्यायों का सार और आज के जीवन में उनका प्रयोग, 10 मूल अवधारणाएँ (धर्म, कर्म, गुण, तीन योग, मोक्ष), तथा 8 अंतःक्रियात्मक उपकरण — एक धर्म-संशय निवारक, गुण-स्व-परीक्षण, योग-मार्ग-दर्शक, तथा कृष्ण-को-गुरु-रूप-में-संवाद। पारंपरिक भाष्य के साथ-साथ हर शिक्षा को आज के निर्णय, सम्बन्ध, कार्य, और मन की स्थिति पर लागू करने का सरल विवरण।
सभी 18 अध्याय
हर अध्याय का सार, मूल शिक्षा, और आज के जीवन में उसका प्रयोग।
अर्जुनविषादयोग — अर्जुन की मूढ़ता का योग
Arjuna Viṣāda Yoga (अर्जुनविषादयोग)
युद्धभूमि पर अर्जुन अपने स्वजनों — गुरुजनों, भाइयों, मित्रों — को विरोधी पक्ष में देखकर शोक से व्याकुल हो उठते हैं। उनके अंग शिथिल हो जाते ह…
साङ्ख्ययोग — ज्ञान का योग, शाश्वत आत्मा
Sāṅkhya Yoga (साङ्ख्ययोग)
श्रीकृष्ण आत्मा के अमर स्वरूप का परिचय देते हैं — जो न जन्म लेती है, न मरती है, न शस्त्र से कटती है, न अग्नि से जलती है। फिर वे कर्मयोग का म…
कर्मयोग — कर्म का योग
Karma Yoga (कर्मयोग)
अर्जुन पूछते हैं — "यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो आप मुझे कर्म में क्यों लगा रहे हैं?" श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं — कोई भी क्षण निष्क्रिय न…
ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग — ज्ञान और कर्म-त्याग का योग
Jñāna Karma Sannyāsa Yoga (ज्ञानकर्मसन्न्यासयोग)
श्रीकृष्ण कहते हैं — "यह योग मैंने आदि-सूर्य को दिया था; समय के साथ यह विलुप्त हो गया।" फिर वे अवतार-वाद की सबसे प्रसिद्ध घोषणा करते हैं — "…
कर्मसंन्यासयोग — कर्म-त्याग का योग
Karma Sannyāsa Yoga (कर्मसन्न्यासयोग)
अर्जुन पूछते हैं — "कर्म-त्याग और कर्मयोग, दोनों में श्रेष्ठ कौन है?" श्रीकृष्ण कहते हैं — दोनों एक ही गन्तव्य की ओर ले जाते हैं; पर कर्मयोग…
ध्यानयोग — ध्यान का योग
Dhyāna Yoga (ध्यानयोग)
श्रीकृष्ण ध्यान का सम्पूर्ण विज्ञान देते हैं — आसन, स्थान, मन की एकाग्रता, इन्द्रिय-संयम, तथा क्रमिक अभ्यास। मन चंचल है — पर वैराग्य और अभ्य…
ज्ञानविज्ञानयोग — ज्ञान और तत्व-बोध का योग
Jñāna Vijñāna Yoga (ज्ञानविज्ञानयोग)
श्रीकृष्ण अपनी दो प्रकृतियों का वर्णन करते हैं — अपरा (पंच-तत्व, मन, बुद्धि, अहंकार से बनी जड़ प्रकृति) और परा (चेतन प्रकृति, जिससे यह सम्पू…
अक्षरब्रह्मयोग — अविनाशी ब्रह्म का योग
Akṣara Brahma Yoga (अक्षरब्रह्मयोग)
अर्जुन पूछते हैं — "मृत्यु के क्षण में जिस वस्तु का स्मरण हो, वही गति मिलती है — तो वह वस्तु क्या है?" श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं — जीवन भर का…
राजविद्याराजगुह्ययोग — राज-विद्या और राज-रहस्य का योग
Rāja Vidyā Rāja Guhya Yoga (राजविद्याराजगुह्ययोग)
श्रीकृष्ण इसे "सर्व-गोपनीय रहस्य" कहकर सर्वोच्च भक्ति-विज्ञान का उद्घाटन करते हैं। यह सम्पूर्ण विश्व मुझमें है — पर मैं इसमें नहीं हूँ। मेरे…
विभूतियोग — दिव्य विभूतियों का योग
Vibhūti Yoga (विभूतियोग)
अर्जुन के अनुरोध पर श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन करते हैं — "जहाँ-जहाँ श्रेष्ठ, सुन्दर, बलवान, या प्रकाशमान कुछ है — वहाँ मुझे जान।" वे…
विश्वरूपदर्शनयोग — विश्वरूप के दर्शन का योग
Viśvarūpa Darśana Yoga (विश्वरूपदर्शनयोग)
अर्जुन की प्रार्थना पर श्रीकृष्ण उन्हें "दिव्य चक्षु" प्रदान करते हैं और अपना विश्व-रूप दिखाते हैं — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ही शरीर में, अनग…
भक्तियोग — भक्ति का योग
Bhakti Yoga (भक्तियोग)
अर्जुन पूछते हैं — "साकार पर भक्ति श्रेष्ठ है या निर्गुण-निराकार का चिन्तन?" श्रीकृष्ण कहते हैं — दोनों मार्ग पहुँचते हैं, पर निर्गुण मार्ग …
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोग — क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभाजन का योग
Kṣetra Kṣetrajña Vibhāga Yoga (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग)
श्रीकृष्ण दो शब्द देते हैं — क्षेत्र (शरीर, इन्द्रियाँ, मन — परिवर्तनशील रंगमंच) और क्षेत्रज्ञ (साक्षी आत्मा जो इन सब को जानती है)। शरीर के …
गुणत्रयविभागयोग — तीन गुणों के विभाजन का योग
Guṇatraya Vibhāga Yoga (गुणत्रयविभागयोग)
श्रीकृष्ण प्रकृति के तीन मूल गुणों का वर्णन करते हैं — सत्त्व (प्रकाश, हलकापन, ज्ञान), रजस (राग, क्रिया, अशान्ति), और तमस (अज्ञान, आलस्य, मो…
पुरुषोत्तमयोग — पुरुषोत्तम का योग
Puruṣottama Yoga (पुरुषोत्तमयोग)
श्रीकृष्ण संसार को एक अश्वत्थ-वृक्ष कहते हैं — जिसकी जड़ें ऊपर हैं, शाखाएँ नीचे, पत्ते वेदों के मन्त्र। इसे वैराग्य रूपी कुठार से काटना ही म…
दैवासुरसंपद्विभागयोग — दैवी और आसुरी सम्पदा के विभाजन का योग
Daivāsura Sampad Vibhāga Yoga (दैवासुरसम्पद्विभागयोग)
श्रीकृष्ण मनुष्य के दो स्वभाव गिनाते हैं — दैवी सम्पदा (अभय, शुद्धि, दान, यज्ञ, क्षमा, सत्य, अहिंसा, मार्दव) और आसुरी सम्पदा (दम्भ, अहंकार, …
श्रद्धात्रयविभागयोग — तीन प्रकार की श्रद्धा का योग
Śraddhātraya Vibhāga Yoga (श्रद्धात्रयविभागयोग)
अर्जुन पूछते हैं — "जो शास्त्र-विधि नहीं जानते पर श्रद्धा से यज्ञ करते हैं — उनकी स्थिति क्या है?" श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं — श्रद्धा भी तीन…
मोक्षसंन्यासयोग — मोक्ष-संन्यास का योग, सारांश
Mokṣa Sannyāsa Yoga (मोक्षसन्न्यासयोग)
अंतिम और सबसे लम्बा अध्याय — गीता का सारांश। श्रीकृष्ण त्याग और संन्यास का भेद, तीन प्रकार के ज्ञान-कर्म-कर्ता, चार वर्णों के स्वधर्म, और अन…
मूल अवधारणाएँ
धर्म, कर्म, आत्मा, ब्रह्म, गुण — गीता की 10 आधारभूत धाराएँ।
धर्म (dharma)
धर्म — तुम्हारा सच्चा मार्ग
धर्म वह आन्तरिक नियम है जो किसी वस्तु को वही बनाए रखता है जो वह है — अग्नि का धर्म जलाना, जल का धर्म प्रवाह, मनुष्य का धर्म चेतन-क…
कर्म (karma)
कर्म — कार्य और उसकी गति
कर्म केवल "कार्य" नहीं — यह कारण-प्रभाव की वह सम्पूर्ण श्रृंखला है जो हर चेतन कर्म से उठती है। आज जो बोते हैं, कल वही काटते हैं — …
निष्काम कर्म (niṣkāma karma)
निष्काम कर्म — फल-त्यागपूर्वक कर्म
गीता का केन्द्रीय व्यवहार-सूत्र (2.47): कर्म पूरे मन से करो, पर फल पर अधिकार मत मानो। फल का त्याग कर्म-त्याग नहीं — यह आसक्ति का त…
त्रिगुण (tri-guṇa)
त्रिगुण — सत्त्व, रजस, तमस
प्रकृति के तीन मूल गुण — सत्त्व (प्रकाश, ज्ञान, शान्ति), रजस (क्रिया, राग, अशान्ति), तमस (अज्ञान, आलस्य, मोह)। हर मनुष्य, हर क्षण …
आत्मन् (ātman)
आत्मा — देह से भिन्न स्वयं
आत्मा वह सत्य है जो शरीर के भीतर रहती हुई शरीर नहीं है — जो जन्म-मरण नहीं देखती, शस्त्र से कटती नहीं, अग्नि से जलती नहीं, जल से भी…
ब्रह्मन् (brahman)
ब्रह्म — परम सत्ता
ब्रह्म वह अन्तिम सत्य है जो सब का स्रोत, सब का आधार, और सब का अन्त है। न आरम्भ, न अन्त, न रूप, न परिमाण — पर हर रूप, हर परिमाण उसी…
मोक्ष (mokṣa)
मोक्ष — मुक्ति
मोक्ष का अर्थ बन्धन से मुक्ति — जन्म-मरण के चक्र से, कर्म-फल की लड़ी से, अहंकार के पिंजरे से। यह कोई स्वर्ग-स्थान नहीं; यह बोध की …
योग (yoga)
योग — एकता और साधना
योग शब्द का अर्थ — "जोड़ना", "मिलाना"। आत्मा का ब्रह्म से मिलन, व्यक्ति का परम से जोड़, अथवा साधारण रूप से — मन की एक-केन्द्रीयता।…
स्वधर्म (svadharma)
स्वधर्म — तुम्हारा अपना धर्म
स्वधर्म वह अद्वितीय कर्तव्य है जो तुम्हारे स्वभाव, स्थिति, और क्षमता से उठता है। यह किसी और का धर्म नहीं हो सकता — और किसी और का ध…
वैराग्य (vairāgya)
वैराग्य — आसक्ति-त्याग
वैराग्य का अर्थ संसार से घृणा नहीं, संसार में आसक्ति का अभाव। वस्तुएँ, सम्बन्ध, अनुभव — सब का स्वागत हो, पर पकड़ नहीं हो। आना सहर्…
प्रसिद्ध श्लोक (अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ)
26 सबसे अधिक उद्धृत श्लोक — संस्कृत, लिप्यन्तरण, और अंग्रेज़ी में अर्थ। हिंदी अनुवाद शीघ्र ही।
- 2.14 Contacts of the senses with their objects — bringing cold and heat, pleasure and pain — come and go. They are impermanent. Endure …
- 2.20 The soul is never born, nor does it die. It has not come into being, will not come into being, and will not cease to be. Unborn, e…
- 2.22 As a person sheds worn-out clothes and puts on new ones, so does the embodied self shed worn-out bodies and take on new ones.…
- 2.47 Your right is to the work itself, never to its fruits. Do not let the fruits of action be your motive, and do not be attached to i…
- 2.48 Established in yoga, perform action, having abandoned attachment, and remaining even-minded in success and failure. Evenness of mi…
- 2.56 He whose mind is undisturbed in sorrow, who craves no pleasure, and from whom attachment, fear, and anger have departed — he is ca…
- 2.62 When a person dwells on the objects of the senses, attachment to them is born. From attachment, desire arises. From desire, anger …
- 3.5 No one can remain even for a moment without performing action. Everyone is helplessly driven to act by the qualities born of natur…
- 3.21 Whatever a great person does, others follow. Whatever standard they set, the world pursues.…
- 3.35 Better one's own dharma, even though imperfectly performed, than the dharma of another well performed. Better death in one's own d…
- 4.7 Whenever there is decline of dharma, O Bharata, and rise of adharma, then I manifest myself.…
- 4.8 For the protection of the good, for the destruction of the wicked, and to re-establish dharma, I am born age after age.…
अंतःक्रियात्मक उपकरण
गीता की शिक्षा को अपने जीवन पर लागू करने के 8 छोटे अभ्यास — धर्म-संकट निवारक, गुण-स्व-परीक्षण, कृष्ण-को-गुरु-रूप-में-संवाद, और अधिक।
उपकरण अभी अंग्रेज़ी में हैं। हिंदी रूप शीघ्र ही।