श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 / 18 · 20 श्लोक · Read in English
15. पुरुषोत्तमयोग — पुरुषोत्तम का योग
Puruṣottama Yoga (पुरुषोत्तमयोग)
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सार
श्रीकृष्ण संसार को एक अश्वत्थ-वृक्ष कहते हैं — जिसकी जड़ें ऊपर हैं, शाखाएँ नीचे, पत्ते वेदों के मन्त्र। इसे वैराग्य रूपी कुठार से काटना ही मार्ग है। तीन पुरुष — क्षर (नश्वर देह), अक्षर (अनश्वर आत्मा), और पुरुषोत्तम (दोनों के परे, परमेश्वर)। जो पुरुषोत्तम को जानता है, वह सर्वज्ञ है।
मूल शिक्षा
संसार-वृक्ष की जड़ें ऊपर हैं — स्थिर, शाश्वत; पत्ते-शाखाएँ नीचे — चलायमान। दृष्टि को ऊर्ध्वमुख करो।
आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
दैनिक जीवन की हर चिन्ता एक पत्ती है — वह आज है, कल नहीं। जड़ को देखो: तुम्हारा सत्य कौन-सा है, जो हर परिस्थिति में रहता है? वही "ऊपर की जड़" है।
इस अध्याय के प्रसिद्ध श्लोक (अंग्रेज़ी में)