श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 / 18 · 24 श्लोक · Read in English

16. दैवासुरसंपद्विभागयोग — दैवी और आसुरी सम्पदा के विभाजन का योग

Daivāsura Sampad Vibhāga Yoga (दैवासुरसम्पद्विभागयोग)

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सार

श्रीकृष्ण मनुष्य के दो स्वभाव गिनाते हैं — दैवी सम्पदा (अभय, शुद्धि, दान, यज्ञ, क्षमा, सत्य, अहिंसा, मार्दव) और आसुरी सम्पदा (दम्भ, अहंकार, क्रोध, लोभ, अज्ञान, छल)। आसुरी प्रवृत्ति मनुष्य को अधोगति की ओर ले जाती है; काम-क्रोध-लोभ — नरक के तीन द्वार — उसे त्यागना ही मुक्ति है।

मूल शिक्षा

काम, क्रोध, लोभ — आत्मा के तीन शत्रु, नरक के तीन द्वार। तीनों का त्याग ही मुक्ति की प्रथम सीढ़ी।

आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है

दैनिक निर्णय में स्वयं से एक प्रश्न पूछें — "यह कर्म दैवी प्रवृत्ति से आ रहा है (सेवा, सत्य, क्षमा) या आसुरी (लोभ, क्रोध, दम्भ)?" उत्तर अक्सर स्पष्ट होता है; बस पूछने की आदत बनानी है।

इस अध्याय के प्रसिद्ध श्लोक (अंग्रेज़ी में)

कृष्ण से प्रश्न पूछें गुण-स्व-परीक्षण लें