श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 / 18 · 28 श्लोक · Read in English
17. श्रद्धात्रयविभागयोग — तीन प्रकार की श्रद्धा का योग
Śraddhātraya Vibhāga Yoga (श्रद्धात्रयविभागयोग)
faith
सार
अर्जुन पूछते हैं — "जो शास्त्र-विधि नहीं जानते पर श्रद्धा से यज्ञ करते हैं — उनकी स्थिति क्या है?" श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं — श्रद्धा भी तीन प्रकार की है: सात्त्विक, राजसिक, तामसिक। आहार, यज्ञ, तप, दान — सब इन्हीं तीन रंगों में रंगे होते हैं। मनुष्य जैसी श्रद्धा रखता है, वैसा ही बन जाता है — "श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।"
मूल शिक्षा
मनुष्य की पहचान उसकी श्रद्धा है — वह जिसे गहराई से सच मानता है, वही धीरे-धीरे वह स्वयं बन जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
आप किसमें श्रद्धा रखते हैं? पैसे में, यश में, सेवा में, सत्य में, परमात्मा में? जिस वस्तु को आप अन्तिम मानेंगे, उसी का रूप आप ले लेंगे। श्रद्धा का चयन — जीवन का सबसे मौलिक चुनाव।