श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 / 18 · 35 श्लोक · Read in English
13. क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभागयोग — क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विभाजन का योग
Kṣetra Kṣetrajña Vibhāga Yoga (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग)
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सार
श्रीकृष्ण दो शब्द देते हैं — क्षेत्र (शरीर, इन्द्रियाँ, मन — परिवर्तनशील रंगमंच) और क्षेत्रज्ञ (साक्षी आत्मा जो इन सब को जानती है)। शरीर के बारे में जो विचार चलते हैं, मन की वृत्तियाँ, सुख-दुख — ये क्षेत्र हैं। इन सब को देखने वाला, "मैं देख रहा हूँ" का बोध, क्षेत्रज्ञ है। योगी का साधना-मार्ग — क्षेत्रज्ञ बनना, क्षेत्र से तादात्म्य छोड़ना।
मूल शिक्षा
जो देखा जा सकता है, वह तुम नहीं हो; जो देख रहा है, वही तुम हो।
आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
जब आप कहते हैं "मुझे क्रोध आ रहा है" — कौन कह रहा है? क्रोध की वृत्ति शरीर-मन में उठी; पर उसे जानने वाला उससे भिन्न है। यह पाँच-शब्द की पहचान चिन्ता, अवसाद, और प्रतिक्रिया को आधा कर देती है।