श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 12 / 18 · 20 श्लोक · Read in English
12. भक्तियोग — भक्ति का योग
Bhakti Yoga (भक्तियोग)
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सार
अर्जुन पूछते हैं — "साकार पर भक्ति श्रेष्ठ है या निर्गुण-निराकार का चिन्तन?" श्रीकृष्ण कहते हैं — दोनों मार्ग पहुँचते हैं, पर निर्गुण मार्ग अति कठिन है; देहधारी के लिए साकार-भक्ति सरल है। तत्पश्चात् वे श्रेष्ठ भक्त के लक्षण गिनाते हैं — जो किसी से द्वेष नहीं रखता, मित्र-शत्रु में, मान-अपमान में, सुख-दुख में सम है, क्षमाशील है, सन्तुष्ट है, मुझमें मन-बुद्धि स्थिर रखता है।
मूल शिक्षा
न किसी से उद्वेग, न किसी से उद्विग्न — वही मेरा प्रिय है। निर्गुण कठिन, सगुण सरल; मार्ग एक ही है।
आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
किसी अमूर्त "विश्व-चेतना" से प्रेम करना कठिन है; एक ठोस मूर्ति, स्मरण, या प्रिय-व्यक्ति में परम का दर्शन सरल। आधुनिक जीवन में — माँ-पिता, गुरु, साथी, बच्चे — ये ही जीवित मन्दिर हैं।
इस अध्याय के प्रसिद्ध श्लोक (अंग्रेज़ी में)