श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 11 / 18 · 55 श्लोक · Read in English

11. विश्वरूपदर्शनयोग — विश्वरूप के दर्शन का योग

Viśvarūpa Darśana Yoga (विश्वरूपदर्शनयोग)

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सार

अर्जुन की प्रार्थना पर श्रीकृष्ण उन्हें "दिव्य चक्षु" प्रदान करते हैं और अपना विश्व-रूप दिखाते हैं — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ही शरीर में, अनगिनत मुख, अनगिनत भुजाएँ, सूर्य-समान तेज, युद्ध के सब योद्धा उसी मुख में काल बनकर प्रवेश कर रहे हैं। अर्जुन कांप उठते हैं — "हे प्रभु, अपना सौम्य रूप ही धारण करें।" यह दर्शन मानवीय अनुभव की सीमा का अतिक्रमण है।

मूल शिक्षा

अन्तिम सत्य का दर्शन सदा सहनीय नहीं; प्रेम का सौम्य मुख ही मनुष्य के लिए द्वार है।

आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है

जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब किसी रोग, मृत्यु, या प्रलय में पूर्ण-यथार्थ दिख जाता है — और हम काँप उठते हैं। तब प्रेम का सौम्य मुख — परिवार, मित्र, स्मरण, श्रद्धा — ही धरती पर वापस लाता है।

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