एक वाक्य में
वैराग्य का अर्थ संसार से घृणा नहीं, संसार में आसक्ति का अभाव। वस्तुएँ, सम्बन्ध, अनुभव — सब का स्वागत हो, पर पकड़ नहीं हो। आना सहर्ष, जाना भी सहर्ष।
इसका वास्तविक अर्थ
गीता 6.35 में अभ्यास के साथ वैराग्य को मन-नियन्त्रण का मुख्य उपकरण बताया गया है। दो प्रकार — अपर वैराग्य (शास्त्र-निन्दित विषयों का त्याग) और पर वैराग्य (पुण्य-फलों से भी अनासक्ति)। उच्चतर वैराग्य वह है जिसमें भले-बुरे, उपयोगी-अनुपयोगी, सब के साथ समान दूरी है।
आज के जीवन में प्रयोग
कुछ प्रिय छूट जाए — व्यक्ति, स्थान, कार्य — और मन शोक से भारी हो जाए। तब स्मरण करें: यह जो जा रहा है, वह कभी "तुम्हारा" था ही नहीं; आया था, गया है। आसक्ति ने ही उसे "मेरा" बनाया था। आसक्ति छूटे, शोक भी छूटे।