एक वाक्य में
स्वधर्म वह अद्वितीय कर्तव्य है जो तुम्हारे स्वभाव, स्थिति, और क्षमता से उठता है। यह किसी और का धर्म नहीं हो सकता — और किसी और का धर्म तुम्हारा नहीं।
इसका वास्तविक अर्थ
गीता 3.35 और 18.47 दोनों स्वधर्म पर बल देती हैं — "अपूर्ण स्वधर्म भी पराये भली-भाँति निभाये गए धर्म से श्रेष्ठ है।" क्यों? क्योंकि पराये धर्म में हम अपने स्वभाव के विरुद्ध कार्य करते हैं — फल मिले भी तो आन्तरिक टूट बढ़ती है। स्वधर्म में अपूर्णता है, पर वह जीवन्त और सच्चा है।
आज के जीवन में प्रयोग
किसी और के मार्ग पर चलने का लोभ हर युग का है — दूसरे की नौकरी, दूसरे का जीवन, दूसरे का व्यक्तित्व। पर तुम्हारा स्वभाव कौन-सा कार्य माँगता है? वही करो — कम सम्पन्न हो तब भी; क्योंकि वहीं तुम पूर्ण हो सकते हो।