एक वाक्य में
योग शब्द का अर्थ — "जोड़ना", "मिलाना"। आत्मा का ब्रह्म से मिलन, व्यक्ति का परम से जोड़, अथवा साधारण रूप से — मन की एक-केन्द्रीयता। योग व्यायाम नहीं, चित्त-वृत्ति-निरोध है।
इसका वास्तविक अर्थ
गीता चार योगों का परिचय देती है — कर्म-योग (कर्म द्वारा), ज्ञान-योग (बोध द्वारा), भक्ति-योग (प्रेम द्वारा), और ध्यान-योग (एकाग्रता द्वारा)। चारों एक ही पर्वत के चार मार्ग — स्वभाव के अनुसार चयन। अध्याय 6 की प्रसिद्ध परिभाषा — "समत्वं योग उच्यते" (समता ही योग है) — सुख-दुख, मान-अपमान, मित्र-शत्रु में अविचलता।
आज के जीवन में प्रयोग
आसन-प्राणायाम योग का एक छोटा अंश है। असली योग — दिन भर समता बनाए रखना। प्रशंसा से अधिक उत्तेजित न होना, निन्दा से अधिक टूटना नहीं — यह आधुनिक "योग-अभ्यास" का सार है।