एक वाक्य में
मोक्ष का अर्थ बन्धन से मुक्ति — जन्म-मरण के चक्र से, कर्म-फल की लड़ी से, अहंकार के पिंजरे से। यह कोई स्वर्ग-स्थान नहीं; यह बोध की अवस्था है — जहाँ "मैं" का भार उठ जाता है।
इसका वास्तविक अर्थ
चार मार्ग मोक्ष की ओर — कर्म-योग (निष्काम कर्म), ज्ञान-योग (आत्म-बोध), भक्ति-योग (समर्पण), और ध्यान-योग (एकाग्रता)। चारों एक ही गन्तव्य की ओर ले जाते हैं। मोक्ष कोई बाहरी प्राप्ति नहीं — यह "अप्राप्ति का अनुभव" है, क्योंकि वह सत्य आप पहले से ही हैं; केवल आवरण उठाना है।
आज के जीवन में प्रयोग
मोक्ष का संकेत — कब चिन्ता गिर जाती है, क्रोध आता ही नहीं, सुख-दुख दोनों में मन समान रहता है। पूर्ण मोक्ष लक्ष्य है, पर हर दिन की छोटी-छोटी मुक्तियाँ — एक चिन्ता का त्याग, एक क्रोध का शान्त होना — मोक्ष की दिशा हैं।