एक वाक्य में
ब्रह्म वह अन्तिम सत्य है जो सब का स्रोत, सब का आधार, और सब का अन्त है। न आरम्भ, न अन्त, न रूप, न परिमाण — पर हर रूप, हर परिमाण उसी का प्रकटन।
इसका वास्तविक अर्थ
गीता ब्रह्म को दो रूपों में दर्शाती है — निर्गुण (बिना गुण के, बिना आकार के, अव्यक्त) और सगुण (साकार, अवतार रूप, श्रीकृष्ण)। दोनों एक ही सत्ता के दो दृष्टिकोण हैं। आत्मा वही ब्रह्म है — "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ) उपनिषद् का महा-वाक्य। आत्मा-ब्रह्म की एकता का बोध ही मोक्ष का बीज है।
आज के जीवन में प्रयोग
जब किसी क्षण आप अनुभव करते हैं कि "मैं" और "विश्व" की रेखा मिट गई — गहरे ध्यान में, प्रकृति में, संगीत में, प्रेम में — वह क्षण ब्रह्म-स्पर्श का है। ऐसे क्षण दैनिक ध्यान का परिणाम होते हैं।