एक वाक्य में
धर्म वह आन्तरिक नियम है जो किसी वस्तु को वही बनाए रखता है जो वह है — अग्नि का धर्म जलाना, जल का धर्म प्रवाह, मनुष्य का धर्म चेतन-कर्म। यह कोई बाहरी नियम-पुस्तिका नहीं; यह तुम्हारे स्वभाव से प्रकट होने वाला कर्तव्य है।
इसका वास्तविक अर्थ
गीता में धर्म चार स्तरों पर है — सनातन धर्म (सब के लिए साझा: सत्य, अहिंसा, क्षमा), वर्ण-धर्म (समाज में भूमिका), आश्रम-धर्म (जीवन-स्तर का धर्म), और स्वधर्म (तुम्हारा अपना अद्वितीय मार्ग)। संघर्ष तब होता है जब दो स्तर टकराते हैं — अर्जुन का कुल-धर्म युद्ध-त्याग चाहता है, क्षत्रिय-धर्म युद्ध माँगता है। गीता का उत्तर: ऊपर के स्तर का धर्म, नीचे के स्तर पर भारी पड़ता है।
आज के जीवन में प्रयोग
जब दो कर्तव्य टकराएँ — परिवार बनाम कार्य, सत्य बनाम मधुरता — तो पूछें: कौन-सा अधिक मौलिक है? जो अधिक मौलिक है, वही धर्म है। अधिक चतुर उत्तर नहीं — अधिक गहरा उत्तर।