एक वाक्य में
कर्म केवल "कार्य" नहीं — यह कारण-प्रभाव की वह सम्पूर्ण श्रृंखला है जो हर चेतन कर्म से उठती है। आज जो बोते हैं, कल वही काटते हैं — चाहे एक क्षण में, एक जीवन में, या कई जीवनों में।
इसका वास्तविक अर्थ
कर्म के तीन प्रकार — संचित (पिछले जन्मों का सम्पूर्ण भण्डार), प्रारब्ध (इस जन्म में फलित होने वाला), और क्रियमाण (वर्तमान में किया जा रहा)। प्रारब्ध बदल नहीं सकता, पर क्रियमाण आपकी स्वतन्त्रता है। आज का प्रत्येक कर्म — विचार, वचन, क्रिया — भविष्य के संचित में जुड़ रहा है।
आज के जीवन में प्रयोग
आप जो अभी कर रहे हैं — किसी से बात, किसी विषय में सोच, कोई आदत — उसकी एक न एक दिन प्रतिक्रिया आएगी। यह "नैतिक न्याय" का प्रश्न नहीं, "भौतिक नियम" का है। बीज से वृक्ष ही उगता है, और कुछ नहीं।