श्रीमद्भगवद्गीता · मूल अवधारणा · Read in English
निष्काम कर्म — फल-त्यागपूर्वक कर्म
निष्काम कर्म (niṣkāma karma)
एक वाक्य में
गीता का केन्द्रीय व्यवहार-सूत्र (2.47): कर्म पूरे मन से करो, पर फल पर अधिकार मत मानो। फल का त्याग कर्म-त्याग नहीं — यह आसक्ति का त्याग है।
इसका वास्तविक अर्थ
फल-त्याग का अर्थ है कि कर्म पर आपका पूरा प्रयास हो, पर परिणाम जैसा भी आए — सुखद, दुखद, अनपेक्षित — उसमें मन की स्थिरता हिले नहीं। यह उदासीनता नहीं; यह गहरी श्रद्धा है कि परिणाम कई कारणों से बनता है, उनमें से एक ही मेरा प्रयत्न है। शेष को छोड़ देना ही समत्व-योग है।
आज के जीवन में प्रयोग
परीक्षा, प्रस्तुति, साक्षात्कार, रिश्ता — पूरी तैयारी कीजिए, पूर्ण मन लगाइए। फिर परिणाम जो भी आए, उसे जीवित-तथ्य मानकर अगला कदम उठाइए। चिन्ता आधी, कार्य पूर्ण।