श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 / 18 · 30 श्लोक · Read in English
7. ज्ञानविज्ञानयोग — ज्ञान और तत्व-बोध का योग
Jñāna Vijñāna Yoga (ज्ञानविज्ञानयोग)
origin
सार
श्रीकृष्ण अपनी दो प्रकृतियों का वर्णन करते हैं — अपरा (पंच-तत्व, मन, बुद्धि, अहंकार से बनी जड़ प्रकृति) और परा (चेतन प्रकृति, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व धारण किया जाता है)। चार प्रकार के भक्त भगवान् की ओर बढ़ते हैं — आर्त (पीड़ित), जिज्ञासु, अर्थार्थी (फलाभिलाषी), और ज्ञानी। ज्ञानी सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि वह भगवान् को अपना आत्म-स्वरूप जानता है।
मूल शिक्षा
मेरे अतिरिक्त कुछ नहीं है — सूत्र में मणियों के समान, यह सम्पूर्ण विश्व मुझमें ही पिरोया हुआ है।
आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
जब आप किसी कठिनाई से सहायता माँगते हैं — पीड़ित होकर, जिज्ञासा से, इच्छा से, या ज्ञान-पिपासा से — सभी मार्ग ठीक हैं। पर सबसे गहरा वह है जिसमें सहायता माँगने वाला और सहायक एक ही तत्त्व के दो रूप हों।
इस अध्याय के प्रसिद्ध श्लोक (अंग्रेज़ी में)