श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 4 / 18 · 42 श्लोक · Read in English
4. ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग — ज्ञान और कर्म-त्याग का योग
Jñāna Karma Sannyāsa Yoga (ज्ञानकर्मसन्न्यासयोग)
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सार
श्रीकृष्ण कहते हैं — "यह योग मैंने आदि-सूर्य को दिया था; समय के साथ यह विलुप्त हो गया।" फिर वे अवतार-वाद की सबसे प्रसिद्ध घोषणा करते हैं — "जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ" (4.7-8)। शेष अध्याय में वे यज्ञ के विविध रूप, ज्ञान का महत्व, और बंधन से मुक्ति के मार्ग की चर्चा करते हैं।
मूल शिक्षा
जब धर्म लड़खड़ाता है तो कोई बाहरी देव-शक्ति नहीं — मनुष्य के भीतर का श्रेष्ठ अंश — उसे पुनः खड़ा करता है।
आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
जब आपका छोटा संसार — परिवार, टीम, संस्था — अधर्म की ओर मुड़ रहा हो, तो किसी और की प्रतीक्षा मत कीजिए। आप ही "अवतार" हैं — साधारण रूप में, साधारण क्षण में, अपने स्थान पर।
इस अध्याय के प्रसिद्ध श्लोक (अंग्रेज़ी में)