श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 / 18 · 43 श्लोक · Read in English
3. कर्मयोग — कर्म का योग
Karma Yoga (कर्मयोग)
action
सार
अर्जुन पूछते हैं — "यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो आप मुझे कर्म में क्यों लगा रहे हैं?" श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं — कोई भी क्षण निष्क्रिय नहीं रह सकता; प्रकृति के गुण ही कर्म कराते हैं। कर्म छोड़ना नहीं, कर्म-फल का संग छोड़ना ही वास्तविक संन्यास है। श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, साधारण जन उसी का अनुसरण करते हैं — इसलिए नेता का प्रत्येक कर्म लोकशिक्षा बन जाता है।
मूल शिक्षा
कर्म छोड़ना मार्ग नहीं; कर्म-फल की आसक्ति त्यागना — यही सच्चा त्याग है।
आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
जो भी भूमिका आपको प्राप्त है — पिता, माँ, छात्र, कर्मचारी, नेता — उसे पूर्ण मनोयोग से निभाइए, क्योंकि आपके आचरण से ही आपके अधीनस्थ सीखेंगे। पलायन सरल है; निर्वहन कठिन और श्रेष्ठ।
इस अध्याय के प्रसिद्ध श्लोक (अंग्रेज़ी में)
- 3.5 No one can remain even for a moment without performing action. Everyone is helplessly driven to act by the qualities born of nature.…
- 3.21 Whatever a great person does, others follow. Whatever standard they set, the world pursues.…
- 3.35 Better one's own dharma, even though imperfectly performed, than the dharma of another well performed. Better death in one's own dharma; the…