श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 2 / 18 · 72 श्लोक · Read in English

2. साङ्ख्ययोग — ज्ञान का योग, शाश्वत आत्मा

Sāṅkhya Yoga (साङ्ख्ययोग)

soul

सार

श्रीकृष्ण आत्मा के अमर स्वरूप का परिचय देते हैं — जो न जन्म लेती है, न मरती है, न शस्त्र से कटती है, न अग्नि से जलती है। फिर वे कर्मयोग का मूल सूत्र देते हैं — "तेरा अधिकार कर्म पर है, फल पर कभी नहीं" (2.47)। यह अध्याय सम्पूर्ण गीता का सार-बीज है; आगे के सोलह अध्याय इसी सूत्र की क्रमिक व्याख्या हैं।

मूल शिक्षा

देह नश्वर है, आत्मा शाश्वत। और कर्म तुम्हारा है, फल तुम्हारा नहीं — यही समत्व का योग है।

आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है

जो भी आप पूरे मन से करते हैं — अध्ययन, परिश्रम, सेवा, साधना — उसका फल आपकी इच्छानुसार आए या न आए, यह आपके वश में नहीं। कर्म पर ध्यान, फल पर निरपेक्ष — यह सूत्र दैनिक चिन्ता को आधा कर देता है।

कृष्ण से प्रश्न पूछें गुण-स्व-परीक्षण लें