श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 / 18 · 29 श्लोक · Read in English
5. कर्मसंन्यासयोग — कर्म-त्याग का योग
Karma Sannyāsa Yoga (कर्मसन्न्यासयोग)
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सार
अर्जुन पूछते हैं — "कर्म-त्याग और कर्मयोग, दोनों में श्रेष्ठ कौन है?" श्रीकृष्ण कहते हैं — दोनों एक ही गन्तव्य की ओर ले जाते हैं; पर कर्मयोग सरल है। बाहर से सब कुछ करते हुए, भीतर से सब छोड़ देना — यही वास्तविक संन्यास है। बाहर का त्याग दिखावा हो सकता है; भीतर का त्याग ही गहरा है।
मूल शिक्षा
संन्यास का अर्थ सब छोड़कर भागना नहीं; भीतर से फल की आसक्ति का त्याग है।
आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
नौकरी छोड़कर हिमालय जाने की कल्पना सुन्दर है, पर आवश्यक नहीं। जिस कार्य में हैं, उसी में रहते हुए "मैं कर्ता हूँ" का अहंकार और "मुझे यह मिले" की आसक्ति छूट जाए — यही जीवित संन्यास है।
इस अध्याय के प्रसिद्ध श्लोक (अंग्रेज़ी में)