श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 / 18 · 34 श्लोक · Read in English
9. राजविद्याराजगुह्ययोग — राज-विद्या और राज-रहस्य का योग
Rāja Vidyā Rāja Guhya Yoga (राजविद्याराजगुह्ययोग)
devotion
सार
श्रीकृष्ण इसे "सर्व-गोपनीय रहस्य" कहकर सर्वोच्च भक्ति-विज्ञान का उद्घाटन करते हैं। यह सम्पूर्ण विश्व मुझमें है — पर मैं इसमें नहीं हूँ। मेरे लिए कोई प्रिय या अप्रिय नहीं; पर जो भक्ति से मुझे पुकारता है, वह मुझमें है और मैं उसमें। एक पत्र, एक पुष्प, एक फल, एक जल — प्रेम से अर्पित — मेरे लिए स्वीकार्य है।
मूल शिक्षा
मेरे लिए कोई बड़ा या छोटा भक्त नहीं; प्रेम से अर्पित एक पत्ता भी पूर्ण है। दूरी प्रेम से नहीं, उपेक्षा से बनती है।
आज के जीवन में प्रयोग — इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
किसी प्रिय को पाँच-तारा भोज नहीं, मन से बनी एक रोटी ही बहुत है। सेवा की मात्रा नहीं, उसमें छिपा प्रेम मूल्यवान है। यह सूत्र हर रिश्ते पर लागू होता है — माँ-बच्चा, मित्र, साथी, टीम।
इस अध्याय के प्रसिद्ध श्लोक (अंग्रेज़ी में)